माता शबरी जिन्होंने पशु हिंसा विरोध में घर का त्याग किया

माता शबरी जिन्होंने पशु हिंसा के विरोध में घर का त्याग किया 

माता शबरी की कहानी वैसे तो भारत के जन जन में प्रचलित है पर एक आदिवासी भीलनी किन परिस्थितियों में अपने समाज का त्याग कर श्री राम की भक्ति में अपना संपूर्ण जीवन ब्यतीत किया इस पक्ष को कभी महत्वपूर्ण विषय मे सम्लित नही किया जाना कही न कही माता शबरी की कहानी में कुछ अधूरा सा लगता है ।माता शबरी का जन्म वर्तमान में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 120 किलोमीटर दूर जांजगीर चापा जिले के शिवरीनारायण नामक  स्थान पर हुवा था। शबरी के बचपन का नाम श्रमणा था।उनके पिता भीलों के मुखिया थे। श्रमणा का विवाह एक भील कुमार से तय हुआ था, विवाह से पहले कई सौ पशु बलि के लिए लाए गए। जिन्हें देख श्रमणा बड़ी आहत हुई.... और मन मे विचार किया  यह कैसी परंपरा? ना जाने कितने बेजुबान और निर्दोष जानवरों की हत्या की जाएगी... इस कारण शबरी विवाह से 1 दिन पूर्व भाग गई और दंडकारण्य वन में पहुंच गई।दंडकारण्य में मातंग ऋषि तपस्या किया करते थे, श्रमणा उनकी सेवा तो करना चाहती थी पर वह भील जाति की होने के कारण उसे अवसर ना मिलाने का अंदेशा था। फिर भी शबरी सुबह-सुबह ऋषियों के उठने से पहले उनके आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ़ कर देती थीं, कांटे चुनकर रास्ते में साफ बालू बिछा देती थी। यह सब वे ऐसे करती थीं कि किसी को इसका पता नहीं चलता था।
कालांतर में महर्षि मतंग ने माता सबरी को  उनकी सेवा भावना और पशु प्रकृति के प्रति अथाह प्रेम को देखकर अपने आश्रम में रहने को स्थान दिया ।जब महर्षि मतंग अपना शरीर त्याग रहे थे तब उन्होंने माता सबरी को प्रभु श्री राम और भ्राता लक्ष्मन  के आने तक उन्हें आश्रम में रह कर प्रभु की प्रतीक्षा तक धरती लोक पर रहने का आदेश दिया ।
चूँकि मेरे द्वारा माता सबरी पर आज  लेख लिखने के पीछे दो कारण थे प्रथम तो यदि आप प्रभु की भक्ति के लिए समर्पित है तो जिन्होंने भगवत भक्ति में अनोखी मिशाल पेश किए है अगर उनकी जयंती हो या जयंती  नजदीक हो तो उन्हें अपने अपने तरीके से जरूर याद कीजिये । इस बार माता शबरी की जयंती 5 मार्च को है इसलिए उनके भक्ति भाव को मैंने अपनी लेखनी के माध्यम से प्रणाम किया और जो दूसरा कारण था उसके विषय मे एक ब्यापक विमर्श की आवश्यकता है परन्तु यदि हम चर्चा में इसे शामिल करें तो विमर्श स्वतः जन जन के बीच जाएगा और इसका प्रभाव कुछ लोगो तक भी प्रभावशाली रहा तो हम अपने उद्देश्य में सफल होंगे।
अब हम मुख्य विषय पर आए तो एक आदिवासी लड़की जिसके  पारिवार के लोगों के जीवन का मुख्य भोजन मांसाहार रहा हो जिसका एक दिन पश्चात विवाह हो और वह अपने घर के समीप उत्सव हेतु काटे जाने वाले जानवरों के लिए व्यथित होकर घर छोड़ दे यह कोई सामान्य घटना नही हो सकती । 
पिछले 2  वर्ष पहले  मैं गोपालगंज से मुज्जफरपुर की यात्रा पर था हर तीन किलोमीटर पर चम्पारण हांडी मीट होटल नजर आए ,बगल के एक यात्री से मैंने पूछा कि हर दुकान पर एक ही बोर्ड क्यो लिखा है ।उसने मुझे बताया कि बड़ा फेमस है आपको पटना और दिल्ली में भी इस नाम से दुकान मिल जाएगा।मुझे आश्चर्य हुआ और दुःख भी लगा कि चंपारण जो  कभी इतिहास में गांधी जी के अहिंसा के प्रयोग  लिए याद किया जाता रहा हो उस बिहार की गौरवशाली  जगह पर इतनी पशु हिंसा वो भी मनुष्य के भोजन लिए ।
खैर यह उस शहर के लोगो को तय करना चाहिए कि उनके शहर का नाम किस चीज के लिए याद किया जाए । हालांकि मैंने माता शबरी को जितना पढ़ा और समझा उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश साफ है हमे  निर्दोष पशु पंछियों  के प्रति उदार बनना चाहिए आज बहुत से जानवर विलुप्त होने के कगार पर है जिनका एक मात्र कारण मानव है।अगर हमें पारिस्थितिक तंत्र को सही रखना है तो हमे ब्यापक रूप से प्रकृति प्रेमी होना होगा उसके लिए हमे समाज मे बैठे हिंसा आधारित भोजन प्रेमियों से शाकाहारी बनने का निवेदन और रेस्टोरेंट पद्यति को छोड़ने का निवेदन करना होगा ,आज पूरे भारत मे जिस प्रकार लोग मांसाहारी भोजन को अपने भोज्य पदार्थ के रूप इस्तेमाल कर रहे है कही न कही यह आने वाला भविष्य बहुत सी समस्या को जन्म देने वाला है क्यो कि
 जैसा खाओगे अन्न वैसा रहेगा मन्न 

आगे माता शबरी की कहानी से आप सभी परिचित ही है जिन्होंने श्री राम जी  को अपने जूठे बैर खिलाये  और प्रभु ने मुस्कुरा कर उनका बैर खाया ,अपना दर्शन दिया और नवधा भक्ति प्रसंग सुना कर माता को बैकुण्ठ में परम स्थान प्रदान किया ।इसलिये शाकाहारी बनिये जीव जंतुओं पर दया का भाव रखिये प्रभु को अति निकट पाने का एक माध्यम यह भी हो सकता है। 5 मार्च 2021 को जयंती के पूर्व इस लेख के माध्यम से माता शबरी को याद करते हुए मैं उनके चरणों मे नमन करता हूं।
जय श्री सीता राम 
जय माता शबरी
मनोज कुमार दुबे ,✍️
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