प्लासी से सीखों

1750 में सिराजुद्दोला जो, बंगाल का नवाब था, उसको ये अंदाजा हो गया कि अंग्रेज इस देश में व्यापार करने नहीं आए है, इस देश को गुलाम बनाने आए है, इस देश को लुटने के लिए आए है. सिराजुद्दोला ने फैसला किया कि अंग्रेजो के खिलाफ कोई बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. उस बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए सिराजुद्दोला ने युद्ध किया अंग्रेजो के खिलाफ, जो 1757 मे पलासी का युद्ध के नाम से मशहूर हुआ ! पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास मात्र 300 सिपाही थे, और सिराजुद्दोला के पास 18000 सिपाही थे लेकिन फिर भी सिराजुद्दोला हार गया !

अंग्रेजो की तरफ से जो लड़ने आया था उसका नाम था रोबर्ट क्लाइव, वो अंग्रेजी सेना का सेनापति था. और भारतवर्ष की तरफ से जो लड़ रहा था सिराजुद्दोला, उसका भी एक सेनापति था, उसका नाम था मीर जाफ़र. रोबर्ट क्लाइव ये जनता था कि अगर भारतीय सिपाहियो से सामने से हम लड़ेंगे तो हम 300 लोग है मारे जाएँगे, 2 घंटे भी युद्ध नहीं चलेगा. क्लाइव ने इस बात को कई बार ब्रिटिस पार्लियामेंट को चिट्ठी लिख के कहा था. क्लाइव की 2 चिट्ठियाँ है उन दस्तावेजो में, एक चिट्ठी में क्लाइव ने लिखा कि हम सिर्फ 300 सिपाही है, और सिराजुद्दोला के पास 18000 सिपाही है. हम युद्ध जीत नहीं सकते है, अगर ब्रिटिश पार्लियामेंट अंग्रेजी पार्लियामेंट ये चाहती है कि हम पलासी का युद्ध जीते, तो जरुरी है कि हमारे पास और सिपाही भेजे जाए.  जब रोबर्ट क्लाइव को कोई सेना मदद देने से ब्रिटिश हुकूमत ने मना कर दिया तब उसने मीर जफ़र जैसे एक गद्दार को बंगाल का नवाब बनाने का लालच देकर उसके सिपाहियों को बिना युद्ध लरे समर्पण करने को राजी करवा लिया!

युद्ध शुरु हुआ 23 जून 1757 को. इतिहास की जानकारी के अनुसार २३ जून १७५७ को युद्ध शुरु होने के 40 मिनट के अंदर भारतवर्ष के 18000 सिपाहियो ने मीर जाफर के कहने पर अंग्रेजो के 300 सिपाहियो के सामने सरेंडर कर दिया.

अपने 300 सिपाहियो की मदद से हिंदुस्तान के 18000 सिपाहियो को बंदी बनाया, और कलकत्ता में एक जगह है उसका नाम है फोर्ट विलियम, उस फोर्ट विलियम में 18000 सिपाहियो को बंदी बना कर ले गया. 10 दिन तक उसने भारतीय सिपाहियो को भूखा रखा और उसके बाद ग्यारहवे दिन सबकी हत्या कराई. और उस हत्या कराने में मीर जाफ़र रोबर्ट क्लाइव के साथ शामिल था. उसके बाद रोबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला की हत्या कराई मुर्शिदाबाद में, क्योकि उस जमाने में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद होती थी, कलकत्ता नही. सिराजुद्दोला की हत्या कराने में रोबर्ट क्लाइव और मीर जाफ़र दोनों शामिल थे. और नतीजा क्या हुआ ? बंगाल का नवाब सिराजुद्दोला मारा गया, ईस्ट इंडिया कंपनी को भागने का सपना देखता था इस देश में वो मारा गया, और जो ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करने की बात करता था वो बंगाल का नवाब हो गया, मीर जाफ़र.

1757 में तो एक मीर जाफ़र था आज हिंदुस्तान में हज़ारो मीर जाफ़र है. जो देश को वैसे ही गुलाम बनाने में लगे हुए है जैसे मीर जाफ़र ने बनाया था, मीर जाफ़र ने क्या किया था, विदेशो कंपनी को समझौता किया था बुला के, और विदेशो कंपनी से समझौता करने के चक्कर में उसे कुर्सी मिली थी और पैसा मिला था. आज जानते है हिंदुस्तान में किसी दल की सरकार बने सभी लोग विदेशी कंपनियों को दावत देते है आज भारत के सरकारी कल कारखाने  या तो बन्द है या बन्द होने के कगार पर है ।भारत मे कम्युनिस्ट पार्टी एवं उसके समर्थित ट्रेड मजदूर यूनियन हड़ताल औऱ सुविधा के नाम पर आए दिन काम रोको प्रस्ताव लाये जिस कारण पश्चिम बंगाल के गौरीपुर, चितरंजन से लेकर उत्तर प्रदेश के नैनी और कानपुर  जैसे औधोगिक शहर आज पीछे होते चले गए ,आज जो सरकारी औधोगिक इकाई खड़ी भी है तो उसके कुछ हिस्सों के शेयर प्राईवेट सेक्टर के पास है।भारत में प्रगतिशील सोच की पार्टी हो या जनतांत्रिक सोच के लोग हो 1980 के बाद सबने सरकारी ब्यवस्था को रौंदने का कार्य किया ,आज देश के बड़े अफसर मीरजाफ़र की भूमिका में है जो कल तक योजना आयोग में बैठते थे आज नीति आयोग में बैठते है ।कोरोना काल के इन दो वर्ष ने  देश के प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी उनकी कार्यप्रणाली ने देश के 80 फ़ीसदी लोगो को छलने का कार्य किया ये मीरजाफ़र की सोच पर आधारित अस्पताल पहले तो पूरी तरह बन्द कर भाग गए और जब  खोलना भी शुरू किए तो इन्होंने गरीब जनता और मध्यम वर्ग को इस प्रकार लुटा जितना अंग्रेज भी इस देश को नही लुटे ।इसलिये वर्तमान सरकार यदि राष्ट्रवाद को अपनी राजनीति का केंद्र बिंदु मानती है तो इन प्लासी के गद्दारों से देश को बचाये देश की ब्यवस्था में सरकारीकरण जरूरी है  एवं शिक्षा और चिक्तिसा 100% सरकारी और  देश की जनता के आशा के अनुरूप होना चाहिए।

मनोज कुमार दुबे 

स्वतंत्र विचारक शिक्षक कवि एवं लेखक 


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