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योग साधना की मौलिक बातें

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योग हमारे शरीर, मन, भावना एवं ऊर्जा के स्‍तर पर काम करता है। इसकी वजह से मोटेतौर पर योग को चार भागों में बांटा गया है : कर्मयोग, जहां हम अपने शरीर का उपयोग करते हैं; भक्तियोग, जहां हम अपनी भावनाओं का उपयोग करते हैं; ज्ञानयोग, जहां हम मन एवं बुद्धि का प्रयोग करते हैं और क्रियायोग, जहां हम अपनी ऊर्जा का उपयोग करते हैं। हम योग साधना की जिस किसी पद्धति का उपयोग करें, वे इन श्रेणियों में से किसी एक श्रेणी या अधिक श्रेणियों के तहत आती हैं। हर व्‍यक्ति इन चार कारकों का एक अनोखा संयोग होता है। ''योग पर सभी प्राचीन टीकाओं में इस बात पर जोर दिया गया है कि किसी गुरू के मार्गदर्शन में काम करना आवश्‍यक है।'' इसका कारण यह है कि गुरू चार मौलिक मार्गों का उपयुक्‍त संयोजन तैयार कर सकता है जो हर साधक के लिए आवश्‍यक होता है। योग शिक्षा : परंपरागत रूप से, परिवारों में ज्ञानी, अनुभवी एवं बुद्धिमान व्‍यक्तियों द्वारा (पश्चिम में कंवेंट में प्रदान की जानी वाली शिक्षा से इसकी तुलना की जा सकती है) और फिर आश्रमों में (जिसकी तुलना मठों से की जा सकती है) ऋषियों / मुनियों / आचार्यों द्व...

आखिर कैकई ने राम को क्यो दिया वनवास जानिए कैकई के त्याग की कहानी?

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आखिर कैकई ने राम को क्यों दिया वनवास जानिए कैकई के त्याग की कहानी? जब हम रामचरितमानस के करीब होते है और माता कैकई का प्रसंग आता है तो एक बार हर कोई उनके कठोर हृदय को देखकर दुखी हो जाता है कि कैसे उन्होंने अपने प्राणों से प्रिय श्री राम को वन भेजने का निर्णय लिया ,और गोस्वामी जी लिखते है कि - तापस बेष बिसेषि उदासी।  चौदह बरिस रामु बनबासी॥ सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।। चक्रवर्ती जी इतना सुनकर ही मूर्छित हो जाते है ,फिर आर्य सुमंत का आगमन होता है और वे श्री राम से कोप भवन चलने का निवेदन करते है , कोप भवन में पिता की हालत श्री राम देखते है तो वे इसका कारण माता कैकयी से पूछते है ,माता ने अपने तीन वचनों की चर्चा के क्रम में सारा वृत्तांत श्री राम को सुनाती है और प्रभु मुस्कुरा कर माता कैकयी से कहते है  सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी।  जो पितु मातु बचन अनुरागी॥  तनय मातु पितु तोषनिहारा।  दुर्लभ जननि सकल संसारा॥ माता मैं प्रातः काल ही अपने प्रतापी पिता के कुल की मर्यदा पालन के लिए वन को जाऊंगा और  श्री राम अपनी भार्या सीता और लक्ष...

भरत चरित्र में त्याग संयम धैर्य और ईश्वर प्रेम का मिलता है उदाहरण

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भरत चरित्र में त्याग, संयम, धैर्य और ईश्वर प्रेम का मिलता है उदाहरण- भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल॥ धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआईं॥ मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू।भरत बचन सुनि भयऊ उछाहू॥ कभी फ़ुर्सत मिलता है तो रामचरितमानस के करीब होता हूं आज माँ को भरत जी का चित्रकूट में राम जी से मिलने की कथा सुनाया , एक भाई का एक भाई के प्रति प्रेम उसके प्रति सम्मान का अगर अनुसरण करना हो तो भरत जैसा नायक पूरे ब्रह्मण्ड में नही मिलेगा । इन्ही गुणों के कारण गुरु वशिष्ठ ने उन्हें महात्मा जैसे संबोधन से सुशोभित किया ,वही जनक  जी उन्हें साधु कहकर उनके चरित्र में एक और सितारा जोड़ देते है।  भ्रातृत्व प्रेम में किसी ने अगर 14 वर्ष तपस्वी जैसा जीवन ब्यतीत किया  तो वह भरत जी है। जिन्होंने प्रभु के  चरणपादुका को ही उनका स्वरुप मानकर अयोध्या की सेवा और सुरक्षा कर पुनः भगवान राम के आने पर उन्हे अयोध्या का राजपाठ सौप दिया ।इन सबके बीच जो मुझे एक बात महत्वपूर्ण लगती है कि जब चित्रकूट से भरत जी श्री राम का आदेश लेकर अयोध्या वापस आते ह...

प्लासी से सीखों

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1750 में सिराजुद्दोला जो, बंगाल का नवाब था, उसको ये अंदाजा हो गया कि अंग्रेज इस देश में व्यापार करने नहीं आए है, इस देश को गुलाम बनाने आए है, इस देश को लुटने के लिए आए है. सिराजुद्दोला ने फैसला किया कि अंग्रेजो के खिलाफ कोई बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. उस बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए सिराजुद्दोला ने युद्ध किया अंग्रेजो के खिलाफ, जो 1757 मे पलासी का युद्ध के नाम से मशहूर हुआ ! पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास मात्र 300 सिपाही थे, और सिराजुद्दोला के पास 18000 सिपाही थे लेकिन फिर भी सिराजुद्दोला हार गया ! अंग्रेजो की तरफ से जो लड़ने आया था उसका नाम था रोबर्ट क्लाइव, वो अंग्रेजी सेना का सेनापति था. और भारतवर्ष की तरफ से जो लड़ रहा था सिराजुद्दोला, उसका भी एक सेनापति था, उसका नाम था मीर जाफ़र. रोबर्ट क्लाइव ये जनता था कि अगर भारतीय सिपाहियो से सामने से हम लड़ेंगे तो हम 300 लोग है मारे जाएँगे, 2 घंटे भी युद्ध नहीं चलेगा. क्लाइव ने इस बात को कई बार ब्रिटिस पार्लियामेंट को चिट्ठी लिख के कहा था. क्लाइव की 2 चिट्ठियाँ है उन दस्तावेजो में, एक चिट्ठी में क्लाइव ने लिखा कि हम सिर्फ 300 सिपाही है, और सिरा...

चिरंजीवी भगवान परशुराम

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विष्णु जी के छठे अवतार चिरंजीवी भगवान परशुराम उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित बलिया जनपद के रतसर में इसी हप्ते भगवान परशुराम की भब्य मूर्ति का अनावरण हुआ ,हालांकि अयोजन समिति ने सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे जनपद को आमंत्रित किया था पर मैं भोपाल की लंबी यात्रा से उसी दिन वापस आया और अपने गाँव ही  पूर्व निर्धारित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में शामिल हुआ ,इसलिये उक्त कार्यक्रम में मेरा जाना नही हो पाया। फिलहाल जब भी समय अनुकूल मिला मैं उक्त मंदिर के दर्शन को जरूर जाऊंगा । यह एक अच्छा प्रयास है इस लिए मैं मुख्य आयोजन कर्ता हिमांशु त्रिपाठी एवं भगवान परशुराम जी के मंदिर में सहयोगी रहे सभी बंधुओ का हृदय से आभार प्रकट करता हूं। धर्मिक साहित्य को पढ़ने के क्रम में मुझे एक बात जो समझ आयी वह यह है कि तमाम अंतर्विरोध के बावजूद जिनका धरती पर अवतार हुवा उनके अवतरित होने पर आप कोई प्रश्न चिन्ह नही लगा सकते उन अवतारों  में भगवान परशुराम जी भी एक ऐसे ऋषि है जिनका अवतार हुवा है जो चिरंजीवी है अर्थात आज भी जीवित है । परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) में एक ब्राह्मण ऋषि के यहां जन्मे थे। जो व...

माता शबरी जिन्होंने पशु हिंसा विरोध में घर का त्याग किया

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माता शबरी जिन्होंने पशु हिंसा के विरोध में घर का त्याग किया  माता शबरी की कहानी वैसे तो भारत के जन जन में प्रचलित है पर एक आदिवासी भीलनी किन परिस्थितियों में अपने समाज का त्याग कर श्री राम की भक्ति में अपना संपूर्ण जीवन ब्यतीत किया इस पक्ष को कभी महत्वपूर्ण विषय मे सम्लित नही किया जाना कही न कही माता शबरी की कहानी में कुछ अधूरा सा लगता है ।माता शबरी का जन्म वर्तमान में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 120 किलोमीटर दूर जांजगीर चापा जिले के शिवरीनारायण नामक  स्थान पर हुवा था। शबरी के बचपन का नाम श्रमणा था।उनके पिता भीलों के मुखिया थे। श्रमणा का विवाह एक भील कुमार से तय हुआ था, विवाह से पहले कई सौ पशु बलि के लिए लाए गए। जिन्हें देख श्रमणा बड़ी आहत हुई.... और मन मे विचार किया  यह कैसी परंपरा? ना जाने कितने बेजुबान और निर्दोष जानवरों की हत्या की जाएगी... इस कारण शबरी विवाह से 1 दिन पूर्व भाग गई और दंडकारण्य वन में पहुंच गई।दंडकारण्य में मातंग ऋषि तपस्या किया करते थे, श्रमणा उनकी सेवा तो करना चाहती थी पर वह भील जाति की होने के कारण उसे अवसर ना मिलाने का अंदेशा था। फिर भी शबरी सुबह-...

भक्ति श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक गंगा भक्त संत शिरोमणि रविदास जी।

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भक्ति श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक गंगा भक्त संत शिरोमणि रविदास जी।  सर्व विद्या धर्म की नगरी और भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी जिसे दुनिया के सबसे प्राचीन नगरो में से एक  होने का दर्जा प्राप्त  है । वरुणा और असी नदियों के नाम से उपजा वाराणसी  जिसे प्राचीन में काशी और मुगल काल खंड में बनारस जैसे नामों से पुकारा गया ।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काशी बाबा भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी  है जहाँ  भगवान शिव की जटाओं से निकलकर मधुर तरंग के साथ माँ गंगा कल कल  करती बहती है ।माँ गंगा का पावन तट प्राचीन काल से संतो महात्माओं का सबसे प्रिय स्थल रहा जहाँ न जाने कितने तपस्वियों और साधकों ने माँ गंगा की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया ।आज जब माघी पूर्णिमा नजदीक है तब मुझे एक ऐसे गंगा भक्त पर लिखने की इच्छा जागृत हुई जिसे प्राचीन काल ने संत शिरोमणि की उपाधि से नवाजा । बनारस के निकट एक गांव में अवतरित संत रविदास का जन्म माघी पूर्णिमा के दिन हुवा था ।संत रविदास को मानने वाले लोग इस दिन वाराणसी पहुँचकर अपने गुरु का स्मरण और उनके चरणों मे शीश झुकाकर अपनी हाजिरी लगा...