आखिर कैकई ने राम को क्यो दिया वनवास जानिए कैकई के त्याग की कहानी?
आखिर कैकई ने राम को क्यों दिया वनवास जानिए कैकई के त्याग की कहानी?
जब हम रामचरितमानस के करीब होते है और माता कैकई का प्रसंग आता है तो एक बार हर कोई उनके कठोर हृदय को देखकर दुखी हो जाता है कि कैसे उन्होंने अपने प्राणों से प्रिय श्री राम को वन भेजने का निर्णय लिया ,और गोस्वामी जी लिखते है कि -
तापस बेष बिसेषि उदासी।
चौदह बरिस रामु बनबासी॥
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू।
ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।
चक्रवर्ती जी इतना सुनकर ही मूर्छित हो जाते है ,फिर आर्य सुमंत का आगमन होता है और वे श्री राम से कोप भवन चलने का निवेदन करते है , कोप भवन में पिता की हालत श्री राम देखते है तो वे इसका कारण माता कैकयी से पूछते है ,माता ने अपने तीन वचनों की चर्चा के क्रम में सारा वृत्तांत श्री राम को सुनाती है और प्रभु मुस्कुरा कर माता कैकयी से कहते है
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी।
जो पितु मातु बचन अनुरागी॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा।
दुर्लभ जननि सकल संसारा॥
माता मैं प्रातः काल ही अपने प्रतापी पिता के कुल की मर्यदा पालन के लिए वन को जाऊंगा और श्री राम अपनी भार्या सीता और लक्ष्मण सहित वन को चले जाते है ।सामान्य रूप से देखे तो माता कैकई ने अपने पुत्र भरत के लिए ही मंथरा के कहने पर राम को वनवास भेजने का निर्णय लिया पर जब हम विद्वानों की शरण मे होते है तो इस कहानी का जो मूल आयाम है वह इस प्रकार है
एक बार युद्ध में राजा दशरथ का मुकाबला बाली से हो गया । राजा दशरथ की तीनों रानियों में से कैकयी अस्त्र-शस्त्र और रथ चालन में पारंगत थीं। इसलिए कई बार युद्ध में वह दशरथ जी के साथ होती थीं।
जब बाली और राजा दशरथ की भिड़ंत हुई उस समय भी संयोग वश कैकई साथ ही थीं। बाली को तो वरदान था कि जिस पर उसकी दृष्टि पड़ जाए उसका आधा बल उसे प्राप्त हो जाता था।
स्वाभाविक है कि दशरथ परास्त हो गए। बाली ने दशरथ के सामने शर्त रखी कि पराजय के मोल स्वरूप या तो अपनी रानी कैकेयी छोङ जाओ या फिर रघुकुल की शान अपना मुकुट छोङ जाओ। दशरथ जी ने मुकुट बाली के पास रख छोड़ा और कैकेयी को लेकर चले गए।
कैकेयी कुशल योद्धा थीं। किसी भी वीर योद्धा को यह कैसे सुहाता कि राजा को अपना मुकुट छोड़कर आना पड़े। कैकेयी को बहुत दुख था कि रघुकुल का मुकुट उनके बदले रख छोड़ा गया है।
वह राज मुकुट की वापसी की चिंता में रहतीं थीं। जब श्री राम जी के राजतिलक का समय आया तब दशरथ जी व कैकयी को मुकुट को लेकर चर्चा हुई। यह बात तो केवल यही दोनों जानते थे।
कैकेयी ने रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए श्री राम के वनवास का कलंक अपने ऊपर ले लिया और श्री राम को वन भिजवाया। उन्होंने श्री राम से कहा भी था कि बाली से मुकुट वापस लेकर आना है।
श्री राम जी ने जब बाली को मारकर गिरा दिया। उसके बाद उनका बाली के साथ संवाद होने लगा। प्रभु ने अपना परिचय देकर बाली से अपने कुल के शान मुकुट के बारे में पूछा था।
तब बाली ने बताया- रावण को मैंने बंदी बनाया था। जब वह भागा तो साथ में छल से वह मुकुट भी लेकर भाग गया. प्रभु मेरे पुत्र को सेवा में ले लें। वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट लेकर आएगा।
जब अंगद श्री राम जी के दूत बनकर रावण की सभा में गए। वहां उन्होंने सभा में अपने पैर जमा दिए और उपस्थित वीरों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दे दी।
अंगद की चुनौती के बाद एक-एक करके सभी वीरों ने प्रयास किए परंतु असफल रहे। अंत में रावण अंगद के पैर डिगाने के लिए आया। जैसे ही वह अंगद का पैर हिलाने के लिए झुका, उसका मुकुट गिर गया।
अंगद वह मुकुट लेकर चले आए। ऐसा प्रताप था रघुकुल के राज मुकुट का। राजा दशरथ ने गंवाया तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी, प्राण भी गए । बाली के पास से रावण लेकर भागा तो उस के भी प्राण गए । रावण से अंगद वापस लेकर आए तो रावण को भी काल का मुंह देखना पड़ा।
परंतु कैकेयी जी के कारण रघुकुल की आन बची। यदि कैकेयी श्री राम को वनवास न भेजतीं तो रघुकुल का सौभाग्य वापस न लौटता। कैकेयी ने कुल के हित में कितना बड़ा कार्य किया और सारे अपयश तथा अपमान को झेला. इसलिए श्री राम माता कैकेयी को सर्वाधिक प्रेम करते थे।जब श्री राम लंका विजय से वापस अयोध्या आते है तो वे सबसे पहले माता कैकई के गृह में जाते है जिसको गोस्वामी जी ने इस प्रकार लिखा है-
प्रभु जानी कैकई लजानी।
प्रथम तासु गृह गए भवानी॥
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा।
पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।
मनोज कुमार दुबे ✍️
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