दिनकर का समाजवाद
शांति नहीं तब तक जब तक
सुख -भाग न सबका सम हो ।
नहीं किसी को बहुत अधिक हो ।
नहीं किसी को कम हो।
स्वत्व माँगने से न मिले ,
संघात पाप हो जाएँ।
बोले धर्मराज शोषित वे
जियें या कि मिट जाएँ ?
न्यायोचित अधिकार माँगने
से न मिले तो लड़ के।
तेजस्वी छीनते समर को,
जीत , या कि खुद मर के।
किसने कहा पाप है समुचित
स्वत्व- प्राप्ति- हित लड़ना ?
उठा न्याय का खड्ग समर में
अभय मारना- मरना ?
देर रात राष्ट्रकवि रामधारी सिंह" दिनकर " को पढ़ते पढ़ते ,कितनी गहरी चिंतन धारा है जो आज के कवियों लेखकों और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की सोच के बाहर की बातों को राष्ट्र कवि ने लिखा है ,इस कठिन मार्ग पर चलने वाले जय प्रकाश नारायण जी, डॉ राम मनोहर लोहिया जी ,जन नायक कर्पूरी ठाकुर जी अनायास हमारे मस्तिष्क के पटल पर छा जाते है जिन्होंने ब्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष किया ,दिनकर जी सहित सभी विभूतियों को नमन ।
मनोज ,✍️
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