जब तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा लिखा
जब गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा लिखा ।
मेरे एक बड़े पिता जी थे स्व पं सुरेश्वर नाथ दुबे जो उत्तर प्रदेश पुलिस में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हालांकि उनकी नौकरी मुरादाबाद जहाँगीरा बाद से प्रारंभ होकर कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी में ही बीता।अपने नौकरी जीवन का आधा समय उन्होंने वाराणसी के पाण्डेयपुर लंका रामनगर दसाश्वमेध संकट मोचन और विश्व्नाथ मंदिर ज्ञानवापी की सुरक्षा ड्यूटी में ही बिताया ,बचपन मे जब कभी हम सबको पिताजी के साथ विश्व्नाथ जी के दर्शन का सौभाग्य मिला बड़े पिता जी की उपस्थिति से काफी सहूलियत मिलती। माँ गंगा, विश्व्नाथ जी और रामचरितमानस में उनकी गहरी आस्था थी और पूरा रामचरितमानस लगभग उन्हें कंठस्थ याद था ,रिटायर्ड के बाद गाँव पर वे हम भाइयों से रामचरितमानस को पढ़ने के लिए कहते और घर की स्त्रियों को उसका अर्थ बताते ,हालांकि वे संस्कृत और अंग्रेजी के भी विद्वान थे ।पठन पाठन के क्रम में मैं तो थोड़ा कम पर मेरे बड़े भाइयों ने उनकी सहायता से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की किताबों का अध्ययन किया । उनके पास कहानियों का भंडार मौजूद था और गर्मी की छुट्टियों में दोपहर में अपने बागीचे में वे हम सबका ज्ञानवर्धक करते।आज आप सबके समक्ष उनके मुख से सुनी हुई गोस्वामी जी द्वारा हनुमान चालीसा लिखने की घटी घटना याद आयी तो सोचा कि इसे लिखकर शेयर करूं क्यो की यह मेरा जीवन भी राम काज हेतु समर्पित है।
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ॥
गोस्वामी तुलसीदास जी के पास बहुत सी चमत्कारी शक्तियां थीं । एक बार एक मरे हुए ब्राह्मण को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था और उसी रास्ते से तुलसीदास जी भी जा रहे थे तभी विधवा औरत ने गोस्वामी तुलसीदास जी के पैरों पे गिर पड़ी और प्रणाम किया, तुलसीदास जी ने उस औरत को "सदासौभाग्यावती " होने का आशीर्वाद दिया, औरत ने कहा मैं सदासौभाग्यावती कैसे हो सकती है मेरे पति अभी मर गए हैं, तुलसीदास ने कहा ये शब्द तो निकल चुके हैं अब इसे जीवित करना पड़ेगा। तुलसीदास जी ने फिर सबसे अपनी आँखे बंद करने को कहा और राम नाम जपने लगे, जिससे वो ब्राह्मण फिर से जी गया।
तुलसीदास की ख्याति से अभिभूत होकर अकबर ने तुलसीदास को अपने दरबार में बुलाया और अपने किसी मरे आदमी को ज़िंदा करने को कहा, परन्तु यह प्रदर्शन-प्रियता तुलसीदास की प्रकृति और प्रवृत्ति के प्रतिकूल थी, अकबर ने उनसे जबरदस्ती चमत्कार दिखाने पर विवश किया, लेकिन ऐसा करने से उन्होंने इनकार कर दिया, फलस्वरूप अकबर ने तुलसीदास को फतेहपुर सिकरी जेल में कैद करवा दिया।
अकबर के समक्ष झुकने के विपरीत तुलसीदास जी ने हनुमान जी का नाम लिया और हनुमान चालीसा जेल में ही 40 दिनों में लिख दिया। तदुपरांत बंदरों की सेना ने किले पे चढ़ाई कर दी, राजधानी और राजमहल में अभूतपूर्व एवं अद्भुत उपद्रव शुरु हो गया। घरों में घुसकर सबको मरने लगे, सैनिकों और द्वारपालों को नोचने लगे, ईंटों को तोड़ने लगे, और सबको उसी ईंट से मारते थे, भयंकर उपद्रव देखने को मिला, सभी बुरी तरह भयभीत हो गए।उसी रात जब अकबर अपने शयन कक्ष में सोया था मध्य रात्रि के करीब उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई काला बंदर उसे जोर जोर से थप्पड़ मार रहा है नींद से उठकर उसने द्वारपालों से किसी बंदर को शयन कक्ष में प्रवेश के विषय मे जानकारी लिया जिस पर द्वारपालों ने कहा जहाँपनाह यहा तो कोई नही आया।प्रातः दीवाने खास में वीरबल और टोडरमल को अकबर ने तलब किया और सारी बात बताई ।वीरबल चूँकि दूरदर्शिता के धनी थे उन्होंने अकबर को बताया गया कि यह हनुमान जी का क्रोध है, अभी केवल उनकी परछाई आप के समीप आयी थी सही का थप्पड़ आप जहाँपनाह नही झेल पाते ,आप जितना जल्द हो सके तुलसीदास जी को जेल से मुक्त कीजिये ,वरना यह परेशानी आगे और बढ़ सकती है यह सुनकर अकबर को विवश होकर तुलसीदास जी को मुक्त कर देना पड़ा, उनसे माफ़ी मांगी और आग्रह किया के किले और राजधानी को बंदरों से मुक्त कराएं।
इसके बाद अकबर तुलसीदास जी के मित्र बन गए और फरमान दिया की उनके राज में राम - हनुमान भक्तों, और दूसरे हिन्दुओं को परेशान नहीं किया जायेगा।
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥
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