चिरंजीवी भगवान परशुराम

विष्णु जी के छठे अवतार चिरंजीवी भगवान परशुराम

उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित बलिया जनपद के रतसर में इसी हप्ते भगवान परशुराम की भब्य मूर्ति का अनावरण हुआ ,हालांकि अयोजन समिति ने सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे जनपद को आमंत्रित किया था पर मैं भोपाल की लंबी यात्रा से उसी दिन वापस आया और अपने गाँव ही  पूर्व निर्धारित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में शामिल हुआ ,इसलिये उक्त कार्यक्रम में मेरा जाना नही हो पाया। फिलहाल जब भी समय अनुकूल मिला मैं उक्त मंदिर के दर्शन को जरूर जाऊंगा । यह एक अच्छा प्रयास है इस लिए मैं मुख्य आयोजन कर्ता हिमांशु त्रिपाठी एवं भगवान परशुराम जी के मंदिर में सहयोगी रहे सभी बंधुओ का हृदय से आभार प्रकट करता हूं।
धर्मिक साहित्य को पढ़ने के क्रम में मुझे एक बात जो समझ आयी वह यह है कि तमाम अंतर्विरोध के बावजूद जिनका धरती पर अवतार हुवा उनके अवतरित होने पर आप कोई प्रश्न चिन्ह नही लगा सकते उन अवतारों  में भगवान परशुराम जी भी एक ऐसे ऋषि है जिनका अवतार हुवा है जो चिरंजीवी है अर्थात आज भी जीवित है ।
परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) में एक ब्राह्मण ऋषि के यहां जन्मे थे। जो विष्णु के छठा अवतार थे। वे जमदग्नि ऋषि के पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये।


भगवान परशुराम महान तपस्वी और योद्धा थे। वे सप्त चिरंजीवियों में से एक हैं। उनका जिक्र रामायण में भी है और महाभारत में भी। वे शस्त्र के साथ ही शास्त्र के भी विशेषज्ञ हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि भगवान परशुराम ब्राह्मण थे या क्षत्रिय?
दरअसल, वै‍दिक काल में व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर ही किसी वर्ण विशेष में शामिल किया जाता था। उसी तरह भगवान परशुराम का जन्म ब्राह्मण कुल में जरूर हुआ था लेकिन वे कर्म से क्षत्रिय थे। ठीक उसी तरह जैसे विश्‍वकर्मा जन्म से क्षत्रिय होने के बावजूद कर्म से ब्राह्मण माने गए।
जन्म से ब्रह्मण, कर्म से क्षत्रिय
महर्षि भृगु के प्रपौत्र, वैदिक ॠषि ॠचीक के पौत्र, जमदग्नि के पुत्र, महाभारतकाल के वीर योद्धाओं भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देने वाले गुरु, शस्त्र एवं शास्त्र के धनी ॠषि परशुराम को दुनियां ने इस रूप में प्रमुख रूप से भी जाना और समझा है ।
भगवान परशुराम योग, वेद और नीति में पारंगत थे। ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में भी वे पारंगत थे। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की। कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें कल्प के अंत तक तपस्यारत भू-लोक पर रहने का वर दिया।
यह तो सभी जानते है कि भगवान परशुराम विष्णु के अवतार थे। पिता जमदग्नि और माता रेणुका की चौथी संतान और उनसे  बड़े उनके तीन भाई थे। परशुराम ने एक बार अपने पिता के कहने पर अपनी माता का वध कर दिया था। इस कारण उन्हें मातृ हत्या का पाप भी लगा। भगवान शिव की तपस्या के बाद ही ये माता की हत्या के पाप से मुक्त हो पाए। हालांकि की संछिप्त कहानी यह है कि
एक दिन गंधर्वराज चित्ररथ अप्सराओं के साथ नदी के तट पर विहार कर रहे थे। उसी समय परशुराम की माताजी रेणुका हवन के लिए जल लेने नदी के तट पर आईं थी। गंधर्वराज और अप्सराओं की क्रीणा देखने में वह इतनी आसक्त हो गईं कि हवन के लिए समय पर जल लेकर नहीं पहुंच सकीं।
हवन काल व्यतीत हो जाने के कारण ऋषि जमदग्नि, माता रेणुका पर अत्यधिक क्रोधित हुए। उनका क्रोध इतना तीव्र था कि उन्होंने अपने बड़े पुत्र को अपनी माता का वध करने का आदेश दे दिया। लेकिन मात्र मोह के कारण वह ऐसा नहीं कर सके।
अंततः यह कार्य परशुराम ने किया जिस पर प्रसन्न होकर उनके पिता ने उन्हें तीन वर दिया जिसमे से उन्होंने एक वर अपनी माता को जीवित करने का मंगा और उनकी वर के कारण पुनः उनकी माता जीवित हुई।
वर्तमान में काल खंड में जातीय दीवार खड़ा करने की नियत से कुछ अज्ञानी भगवान परशुराम को क्षत्रिय विरोधी के रूप में  पेश करते है ,कुछ क्षत्रिय समाज के लोगो को भी मैंने भगवान परशुराम से कन्नी काटते देखा है ,जो सरासर गलत है ।पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने क्षत्रियों के कुल के हैहय वंश का समूल विनाश किया था। दरअसल, हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन ने अपने बल और घमंड के कारण लगातार ब्राह्राणों और ऋषियों पर अत्याचार कर रहा था। जब इस बात की जानकारी भगवान परशुराम को चली तो उन्होंने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया।  ठीक उसी प्रकार जब रावण जैसे महाज्ञानी  ब्राह्मण जब धर्म को छोड़कर अधर्म की राह पकड़ा तब् श्री राम का अवतार हुवा और उन्होंने रावण का वध किया। श्री राम जी का धरती पर अवतार हो गया है यह गूढ़ रहस्य भी भगवान परशुराम के कारण ही उस समय सार्वजनिक हुवा। वे किसी समाज और सभ्यता के विरोधी नही बल्कि अत्याचार और पाप के संहारक थे ,उनके कारण  क्षत्रिय कुल का गौरव बढ़ा उन्होंने श्री राम को अपने से भी श्रेष्ठ माना।
रामायण के कालखंड में ही भगवान परशुराम को अपने अवतार के सम्पूर्ण होने का पता चला और उन्होंने श्री राम के हाथों अपने संपूर्ण यश कीर्ति वैभव पराक्रम अहंकार क्रोध का शमूल नाश करने की प्रार्थना किया और अपना निवास स्थान महेंद्र पर्वत को चुना हालांकि महाभारत काल तक भगवान परशुराम ने धरती पर आकर भगवान कृष्ण सहित कई महारथियों गंगा पुत्र भीष्म दानी  कर्ण  और द्रोणाचार्य के गुरु बनकर उन्हें शस्त्र विद्या में निपुण किया पर इस काल खंड के पश्चात ऐसा माना गया कि भगवान परशुराम चिरंजीवी रूप में है और पृथ्वी औऱ उसके प्राणियों की रक्षा हेतु संकल्प बद्ध है।इस बार  भगवान परशुराम जी की जयंती 14 मई को है भगवान परशुराम सबका कल्याण करें।
मनोज कुमार दुबे ✍️
(कॉपीराइट सुरक्षित)

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